जहां परवाह नहीं, वहां प्रेम नहीं जहां दया नहीं, वहां प्रेम नहीं जहां मधुर वाणी नहीं,वहां प्रेम नहीं जहां अपनत्व नहीं,वहां प्रेम नहीं जहां कटाक्ष हैं, वहां प्रेम नहीं मलिन मनों में जहां धुंध कुहासे हों वहां प्रेम नहीं जहां दिखावा है, वहां प्रेम नहीं जहां लाभ हानि के मापदंड नातों पर हावी हो जाएं,वहां कतई प्रेम नहीं जहां संवेदना नहीं, वहां प्रेम नहीं और जहां प्रेम ही नहीं,वहां जाना ही क्यों हो???? प्रेम सीखना हो तो एक बार एक ही पेज *स्नेहांजलि* का और एक पेज *हानि धरा की लाभ गगन का* में से पढ़ लेना,दोनों ही प्रेम की पराकाष्ठा प्रेम से पूरा जीवन जी गई,मंत्र और ग्रंथ सी दोनों ही किताबें प्रेम की बारहखड़ी अच्छे से समझा देंगी,इसमें 11 स्वर और 33 व्यंजन भी प्रेम के ही हैं,भाव प्रेम के,शब्द प्रेम के,लहजे प्रेम के सब प्रेममय **प्रेम हो जब परिवार में फिर क्या रखा है बाकी संसार में**