जीवन कितना *क्षणभंगुर*है…
इस क्षण भंगुर से जीवन में हम स्थाई भौतिक सुख चाहते हैं,
इसे विडंबना कहते हैं,याद रहे
ना जाने कब किसका साथ छूट जाए, ना जाने कब कौन सी मुलाक़ात आख़िरी हो जाए,कुछ नहीं पता
*क्या छिपा वक़्त के पन्नों में
ना तुम जानो ना हम जाने*
इसलिए जब तक हम एक-दूसरे के साथ हैं, तब तक एक दूसरे की परवाह करें, देखभाल करें, सम्मान करें
एक दूसरे को प्रेम दें, साथ दें,सहयोग दें और जहाँ संभव हो, किसी के जीवन को थोड़ा सहज और सुंदर बनाने का प्रयास करें,परवाह प्रेम का ही पर्याय है
जीवन के इस पड़ाव पर आकर सोचती हूँ ..क्या तेरा, क्या मेरा?
जिसके लिए हम जीवन भर इतना जोड़ते, सँभालते और कभी कभी लड़ते रहते हैं, उसमें से आखिर हमारे साथ क्या जाएगा?
न धन जाएगा, न वस्तुएँ, न पद, न प्रतिष्ठा…
साथ जाएगा तो केवल हमारे कर्मों का भाव और हमारे द्वारा बाँटा गया *प्रेम*
फिर इतनी हाय-हाय क्यों?
इतना मेरा-तेरा क्यों?
क्यों न शेष जीवन को थोड़ा और सरल बना लें,विशेष बना लें
मन में किसी के लिए कटुता न रखें, जहाँ संभव हो क्षमा करें,जहाँ जरूरत हो हाथ थामें और जहाँ अवसर मिले प्रेम बाँटें क्योंकि अंततः जीवन की सबसे बड़ी कमाई यही है कि हमारे होने से किसी के जीवन में थोड़ी खुशी,थोड़ा सुकून और थोड़ा प्रेम बढ़ा हो,जब तक यह साथ है,एक-दूसरे के लिए रहें…
प्रेम से रहें…
और प्रेम बाँटते रहें
यही जीवन की सच्ची सुंदरता है🙏
हमसे ज़्यादा ये बात हमारे बच्चे समझते हैं वे किसी भी प्रकार के पचड़ों से परे हैं
अवलोकन बहुत ज़रूरी है,आत्म मंथन ज़रूरी है और जहाँ हमारी ग़लती हो वहाँ माफ़ी माँग लें और जहाँ किसी ने गलती की हो वहाँ उसे माफ़ कर सके …
हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे .. ऐसी प्रार्थना भगवान से हर दिन हम करे .
जब जागो होता है तभी सवेरा
*ना कुछ तेरा ना कुछ मेरा
मन में प्रेम की ज्योति जले निरंतर
लगेगा फिर नहीं अंधेरा
स्नेह,करुणा,परवाह,सहयोग,कर्मठता
ज्ञान,विवेक,सहजता जहां एक ही छत के तले सारे करते हैं बसेरा
वहाँ तो रोज दिवाली रोज ही होली होती है,स्नेह संग सम्मान भी होता है घनेरा*
Comments
Post a Comment