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माँ के सर्वोत्तम गुण article by snehpremchand

"धरा पर ईश्वर का पर्याय है मां"
"जीवन में सबसे अच्छी राय है माँ"
"समस्या है अगर कोई तो समाधान है मां"
"कुदरत का प्राणी जगत को सबसे अनमोल वरदान है मां"।।
ना तो लेखनी  में इतनी स्याही है, न हीं शब्दों में इतनी शक्ति, जो मां के गुणों का बखान कर सकें। जिंदगी का परिचय अनुभूतियों से कराने वाली,हर संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण का बोध कराने वाली मां का स्थान तो ईश्वर से भी ऊपर है।ईश्वर को हमने देखा नहीं, पर मां को तो देखा भी है, महसूस भी किया है। हर घर वह मंदिर है, जहां मां रहती है।मां तो हमारे जीवन की पहली शिक्षिका, पहली पहली सहेली,पहला साथ, पहला एहसास, पहला सुरक्षा कवच,पहली स्नेह गागर होती है जो आजीवन हमें अपने वात्सल्य जल से आकंठ तृप्त करवाती है। मां के विषय में यह दो पंक्तियां सार्थक एवं सटीक हैं।
 "हमारे जन्म से अपनी मृत्यु तक जो दिल में हमें बसाती है।
 कोई और नहीं वह प्यारे बंधु सिर्फ मां कहलाती है"।
मां शब्द से तन मन के सारे तार पल भर में ही झंकृत हो जाते हैं। घर के गीले चूल्हे में इंधन सी जलती रहती है मां। कभी कुछ नहीं कहती, चुप रहती है, पर जाने क्या क्या कर जाती है मां। हमसे हमारा ही परिचय कराती है मां,समय के आईने में सुनहरे मुस्तकविल उर्फ भविष्य का प्रतिबिंब दिखाती है मां। हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य में जुगनू सी चमकती रहती है मां। पंखों को परवाज देती है मां।सपनों को हकीकत में बदलने का सामर्थ्य रखती है मां। मां तो प्रेरणा का वह दीपक है जो औलाद के जीवन को सदैव रोशन रखता है।
 माँ के विषय में हर युग हर काल में प्रासंगिक यह पंक्तियां 
"एक अक्षर के छोटे से शब्द में सिमटा हुआ है पूरा जहान"
"न कोई था ना कोई है ना कोई होगा मां से बढ़कर कभी महान"
"ना नाप, न सीमा,ना सरहद कोई मां के प्रेम की
 मां इंसा को कुदरत का वरदान।
 नहीं संभव हम शब्दों में कर पाए मां के गुणों का कभी बखान"।।
 वैसे तो मां के व्यक्तित्व और कृतित्व का आंकलन करना आदित्य को दीपक दिखाने जैसा है,परंतु एक छोटी सी कोशिश एक अदना सा प्रयास है मेरा।यदि अधोलिखित गुण मां के अस्तित्व में समावेश कर जाएं तो इस सृजन की देवी का महत्व बताना शब्दातीत होगा।
मित्रवत होना
 मां से अच्छा मित्र तो कोई हो ही नहीं सकता बशर्ते मां ने हमारी तरबीयत उर्फ परवरिश एक मित्र की भांति की हो। मां से बढ़कर हमारा हितैषी भी कोई नहीं होता। मां जीवन के कुरुक्षेत्र में वह गीता है, जो सदैव कर्म का शंखनाद बजाती है। प्रयासों की गंगोत्री से बहने वाली सफलता की सरिता, पावन गंगा है मां ।हम जन्म से ही मां के संपर्क में होते हैं, हमारी आदतों, गुणों अवगुणों, सपनों, शौकों, ख्वाबों, कमजोरियों से भलीभांति परिचित होती है मां।अपनी जरूरतों को भी हमारे शौक पूरा करने की खातिर फना कर देती है मां। मां तो ऐसा सच्चा मित्र है जो किसी भी हाल में हमारा साथ नहीं छोड़ती।जिंदगी की धूप छांव में,खुशी गम में,हर मोड़ पर हमारे साथ होती है। क्या मां से बेहतर कोई खैरख्वाह है??? हर सुख-दुख को सांझा करने वाली मां हमारी सबसे बड़ी राजदार भी होती है।उससे कुछ छुपा नहीं होता, वह सब जानती है, बेशक कई मर्तबा कहती नहीं, एक अच्छी मां अपने बच्चों से मित्रवत व्यवहार करती है। मां के लिए भी यह उपलब्धि है यदि बच्चा उससे एक मित्र की भांति व्यवहार करता है,हर समस्या का बेहतरीन समाधान है मां। मां के किरदार का हमारे जीवन में दूसरा कोई विकल्प नहीं, जिंदगी की पगडंडी पर साथ साथ चलने वाला सबसे अच्छा मित्र माँ तो औलाद के लिए मुकम्मल जहान है।।
 बेहतरीन शिक्षक 
मां अपनी संतान की रग रग से वाकिफ होती है। उसके गुणों अवगुणों से भलीभांति परिचित होती है। मां बालक के जीवन की प्रथम शिक्षिका होती है ।मात्र अक्षर ज्ञान ही नहीं जीवन की पाठशाला में आने वाली अनेक चुनौतियों एवं समस्याओं से रूबरू होकर उनका हल निकालने का हौसला देती है मां। अनेक ऐतिहासिक उदाहरणों, कहानियों, घटनाओं द्वारा मां पग-पग पर हमें शिक्षित और संस्कारित करती रहती है। भले ही हम अक्षर ज्ञान पाठशाला से लेते हैं परंतु व्यवहारिक,भावनात्मक और सामाजिक ज्ञान मां से बेहतर तो कोई दे ही नहीं सकता। धार्मिक ज्ञान भी मां का ही क्षेत्र कहलाता है।मां हमारी जैसी परवरिश करती है उसका प्रभाव ताउम्र दिलो-दिमाग पर रहता है। भले ही वक्त की धूल इसे भुला दे पर चेतन और अवचेतन मन में मां का प्रभाव कभी कम नहीं हो सकता।एक ही बात को अनेक ढंग से बिना थके सिखाती है मां। मां तो वह आफताब उर्फ सूरज है जिसकी आब उर्फ चमक समय के साथ-साथ बढ़ती रहती है हमारे कजा उर्फ भाग्य को अपने कर्म की कूची से बदल देती है मां। पाककला भी जो हम माँ से सीखते हैं वह ताउम्र हमारे साथ चलती है स्पष्ट हो जाता है कि मां से बेहतरीन शिक्षक तो कोई हो ही नहीं सकता। हमारे आचार, व्यवहार,कार्यशैली में मां के दर्शन स्प्ष्ट होते हैं।
संस्कारों की शिक्षा 
हम कितनी ही तकनीकी, वैज्ञानिक उच्च शिक्षा किसी भी बड़े महाविद्यालय से अर्जित कर लें, परंतु जब तक शिक्षा के मस्तक पर संस्कारों का टीका नहीं लगता उस बड़ी शिक्षा का भी कोई महत्व नहीं। संस्कारों की शिक्षा मां से बढ़कर कोई भी नहीं दे सकता। संस्कारों की घुट्टी तो मां से बेहतर ईश्वर भी हमें नहीं पिला सकता। सत्य अहिंसा, संयम ,साहस, भाईचारे का पाठ माँ ही तो हमें पढ़ाती है एक अच्छी मां की यह सबसे बड़ी खूबी है। हमारा हमारी ज़िम्मेदारियों,प्राथमिकताओं
और कर्तव्यों से माँ ही  तो परिचय करवाती है। रिश्तो के पौधों में अपनत्व की खाद,प्रेम का पानी और मीठी वाणी की हवा डालना भी माँ ही सिखाती है।जरूरी नहीं उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति संस्कारी भी हो, अक्सर निरक्षर लोग भी संस्कारी हो सकते हैं।शिक्षा और संस्कार दोनों का सहयोग तो सोने में सुगंध के समान है, जो मां हमें देती है। कुसंगति से दूर रहने की शिक्षा, मांसाहार मदिरापान और अनेक व्यसनों से दूर रहने की शिक्षा मा ही हमें देती है। सृजन की मूर्ति नारी जाति का आदर करना भी माँ ही तो हमें सिखाती है।।
 समझ 
मां अपने व्यवहार से, समस्याओं का समाधान करने के तरीके से, एक उचित स्पेस 
देकर, उचित ज्ञानवर्धक साहित्य उपलब्ध करवाकर,कथनी और करनी में अंतर ना करके बच्चों के अंदर सही निर्णय लेने की,किसी खास परिस्थिति में सही व्यवहार करने की,प्राथमिकताएं चयन करने की, रिश्तो में तालमेल रखने की समझ पैदा कर सकती है, जोकि हमारे व्यक्तित्व विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।एक अच्छी मां का यह अति विशेष गुण है।।
 सहज भाव
बच्चे मां के व्यक्तित्व की ही परछाई होते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया करना ही हमारे व्यवहार का आधारभूत स्तंभ है, जो हम जाने-अनजाने मां से ही सीखते हैं। खुशी में अत्यधिक उत्तेजित ना होना, किसी कष्ट में अधिक विचलित ना होना यही तो सहज भाव है।जिंदगी के तूफानों से लड़ने की शक्ति होना, कैसा भी तूफान हो, संघर्षरत रहना, हौंसला न टूटना इन सहज भावों को मा ही तो हमारे अंदर ऐसे रोपित अंकुरित पल्लवित और पुष्पित करती है जैसे कोई हलधर धरा के सीने में कोई बीज उगाता है।।
मेहनती माँ
एक मेहनती मां बच्चे को भी मेहनतकश होने का पाठ पढ़ा देती है सफल जीवन का कोई शॉर्टकट नहीं होता और यदि है भी तो वह बहुत अल्पकालिक है दीर्घकालिक नहीं। बच्चों के लिए काम करके भी मां को पुर तकल्लुफ उर्फ आनंद मिलता है यह सत्य सर्वविदित है।उपलब्ध सीमित संसाधनों में भी बेहतरीन करने की इच्छा रखने वाली मां का कोई सानी हो ही नहीं सकता। जोश, जज्बा और जुनून मां से बेहतर कोई पैदा ही नहीं कर सकता। ख्वाबों को हकीकत में बदलने के लिए मेहनत तो करनी ही होगी। मां हमारे ख्वाबों के पौधों में सतत अपनी मेहनत का पानी डालती रहती है। संतान को ऊंचे मुकाम पर देखना सदा ही मां की हसरत रहती है। जिजीविषा पैदा करना भी मां का ही महत्वपूर्ण काम है संतान को किसी भी प्रकार के अवसाद और निराशा से बाहर निकालकर मा उसके जीवन में आने वाले हर धुंध कुहासा को मिटाने का अपनी मेहनत और विवेक के आधार पर भरसक प्रयास करती है।।
 प्रेरणास्त्रोत
 घर में घुसते ही मां मां की आवाज लगाने वाले बच्चे के लिए मां से बढ़कर कोई और प्रेरणा स्त्रोत तो हो ही नहीं सकता।बच्चे हमारे जीवन की ही तो प्रतिध्वनि,परछाई और प्रतिबिंब हैं जो देखते हैं, वही सोचते हैं जो सोचते हैं, वही करते हैं और जो करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। मां हमारे सपनों के पौधों में लगातार खाद डालती रहती है और अपनी मेहनत,लगन, ममता, विश्वास और समर्पण के आधार पर  इस पौधे को दरख़्त बनते हुए भी देखती है।छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप, विवेकानंद लव कुश इन सब महान विभूतियों की प्रेरणा स्त्रोत उनकी माँ ही तो थी ।मां तो वह सागर है जिसमें प्रेरणा के असंख्य मोती हैं। पथभ्रष्ट और सोए हुए जमीर को जगाने का मादा रखती है मां।।
 उत्साहवर्धन----- 
एक अच्छी मां की भूमिका उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब कभी उसके बच्चे किसी बुरी संगति में पड़ जाते हैं ।व्यसनों के अधीन हो जाते हैं। आलसी,कामी,क्रोधी हिंसक,अवसादी बच्चों को इस दलदल से निकाल कर बाहर लाने में मां से बेहतर मनोचिकित्सक का काम तो कोई कर ही नहीं सकता।हमारी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर मां ही उत्साहवर्धन करती है समस्त धुंध कुहासों  से बाहर निकालने का यथासंभव प्रयास करती है। एक अच्छी मां बच्चों को निराशा से उभार कर लाती है। एक नई ऊर्जा, नई चेतना का संचार करती है,एक निर्धारित लक्ष्य न भी मिल पाए तो हतोत्साहित नहीं होने देती। असीम संभावनाओं से भरे हुए इस जगत में हमारे लिए कोई न कोई अच्छा विकल्प ढूंढ ही लेती है। जरूरत के समय सदा साथ रहती है जिंदगी के हर मोड़ पर उत्साह बढ़ाती है, ताकि हमारी जिंदगी की गाड़ी में कोई मार्ग अवरोधक ना आ जाए। यह सरपट दौड़े, यही कारण है सुख हो या दुख दर्द हो या चैन हो माँ ही याद आती है।।
मृदुभाषी---
बचपन में लिखी हुई शब्दावली का बहुत बड़ा हिस्सा ताउम्र हमारे जेहन में रहता है। चार पांच साल तो बच्चा अधिकतर मां के सानिध्य में ही समय बिताता है। हर क्यों, क्या, कब, कैसे का जवाब माँ ही तो है। मां जिस भाषा में बच्चों के प्रश्नों का उत्तर बनती है वही भाषा बच्चे की भाषा बन जाती है। एक समझदार मां सदैव सोच-समझकर बोलती है ना कि बोलने के बाद सोचती है। वाक्यों में मुहावरे,लोकोक्तियां और महान लोगों के कथनों को यदि मां अपनी भाषा का हिस्सा बना लेती है तो बच्चे सहज रूप से यह सब सीख जाते हैं। मां का पिता से व घर के अन्य सदस्यों से जैसा वार्तालाप होता है उसका भी सीधा असर बच्चे के दिलों दिमाग पर पड़ता है। घने अंधेरे में आशा के जुगनू होते हैं मधुर बोल।।
ज्ञानी---
 मां यदि ज्ञानी व जिज्ञासु है तो निश्चित रूप से बच्चे में यह गुण देर सवेर से आ ही जाते हैं। एक जागरूक माँ देश विदेश में हो रही घटनाओं से खुद को भी अपडेट रखती है एवं बच्चों को भी रख सकती है।विविध विषयों पर वार्तालाप, वाद-विवाद कर बच्चों में तार्किक शक्ति का उदय हो सकता है। मां का ज्ञान बच्चों के लिए एक खुला शब्दकोश है।
 दृढ़ संकल्प---
एक अच्छी मां में दृढ़ संकल्प होना भी उसका आधारभूत गुण है यही वह गुण है जो बच्चों में लक्ष्य निर्धारण की क्षमता को सशक्त करता है। बच्चे तो कच्ची माटी होते हैं काफी हद तक जिस आकार में ढाले जाते हैं उसी आकार में ढल जाते हैं। मां का चुनौतियों के प्रति व्यवहार बच्चों के व्यवहार की नींव है।
 सकारात्मकता
शुक्रिया या शिकायत दोनों में से शुक्रिया या नेहमतो का चयन हमारी सकारात्मकता दिखाता है।हर समय शिकायतों का रोना रोना हमारी नकारात्मक सोच को दिखाता है। मां अपनी पॉजिटिव सोच से नेगेटिव हालातों को भी पॉजिटिव बना देती है। अंधेरे में आशा का आफताब है मां की सकारात्मक सोच। मां के बोल,मां के मशवरे, माँ का घावों पर मरहम लगाना और कहीं नहीं मिलता।
 "मरुधर में शीतल छाया है मां,
 बेगानों में अपनत्व का अनहद नाद है माँ, जीवन के सबसे मधुर सरगम है मां"।। अनुशासित मा----
 समय का महत्व समय का सदुपयोग भले ही यह निबंध हम बचपन से रटते, लिखते आए हैं परंतु एक अनुशासित माँ ही समय की महत्ता का सही दर्पण अपनी औलाद को दिखा सकती है। मां बच्चे को समझा सकती है "का वर्षा जब कृषि सुखाने" और "अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" सही समय पर सही काम को करना कितना जरूरी और महत्वपूर्ण है इस सोच के अंकुर बाल्यकाल से ही बच्चे के लिए दिल में रोपित करना बहुत जरूरी है। शारीरिक व्यायाम करना, जल्दी उठना,सही खानपान की आदतें, अखबार पढ़ना,समाचार सुनना, घर में बड़े बुजुर्गों का आदर सम्मान करना, छोटों से प्रेमवत व्यवहार करना इन संस्कारों के घुट्टी एक अनुशासित मा ही पिला सकती है।
 रुचिअभिवर्धन----
एक अच्छी मां अपने बच्चों को जीवन की राह दिखाती है परंतु बिना किसी मानसिक या भावनात्मक दबाव के।मां की पारखी नजर बच्चे के रुचियों को भलीभांति देख लेती है,समझ लेती है, बच्चे की वांछित इच्छाओं की बढ़ोतरी के लिए मां और सतत प्रयास करती है। साहित्य, संगीत कला, विज्ञान, तकनीकी जिस भी क्षेत्र में बच्चे की रुचि होती है मां उसे दिशा ज्ञान दे सकती है। जरूरी नहीं कि एक बच्चा बहुत अच्छा डॉक्टर बने, हो सकता है कि वह बहुत अच्छा संगीतज्ञ बन जाए।मनपसंद विषय में शिक्षा दिलवाई जा सकती है जो बच्चे के सुनहरे मुस्तक बिल में मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह कार्य मां से बढ़कर कोई नहीं कर सकता।
 पारखी नजर-----
मां के पास शायद शिव के समान तीन नेत्र होते हैं यही कारण है कि हमारी आदतें, गुण, अवगुण, कमजोरियां माँ से छिप नहीं रह सकते। एक अच्छे बच्चे के गुण पहचान कर उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा माँ ही देती है ।
समय देना-----
 बच्चे के लिए महंगे उपहार कीमती चीजें इतना मायने नहीं रखती जितना मां के साथ बिताए अनमोल लम्हे। मां से गुण आत्मसात कर बच्चा जिंदगी की जंग आसानी से जीत लेता है। मां के साथ बिताए गए समय से बढ़कर बच्चे के लिए कोई उपहार नहीं।एक अच्छी माँ भली भांति यह जानती है।।
सुलभ होना.....
 मां बच्चे का नाता सरल सहज और मधुर होना चाहिए। मन की बात एक अच्छी मां से ही की जा सकती है।बच्चे के मन की बात मन में ना रह जाए।मां को कठोर नहीं होना चाहिए। जब भी जिंदगी के किसी भी मोड़ पर मां की जरूरत हो तो बच्चे को मां का साथ, मां की राय का मिलना खुदा की नेहमतो के समान होता है।
 फॉरगिविंग-----
इंसान गलतियों का पुतला है। बच्चे केवल पारिवारिक परिवेश में ही नहीं रहते हैं। बाहर उनके मित्र गण,अध्यापक गण,परिचित, रिश्तेदार सब उसके व्यवहार के निर्धारक कारक होते हैं।कई बार बच्चे बुरी संगत में पड़कर अनेक गलतियां भी कर देते हैं। एक अच्छी मां उन्हें माफ कर जीवन की आगे की राह दिखाती है। कुछ गलत काम करने पर उन्हें मझधार में छोड़ कर कभी नहीं जाती।हर मावस के बाद पूनम भी आती है। यही नजरिया मां अपनाती है। इसी सोच के साथ धीरे-धीरे बच्चों की परवरिश भी सही हो जाती है।
 शांत----
 एक शांत व्यक्ति ही दूसरे बेचैन व्यक्ति को शांत कर सकता है। स्वयं हीअशांत व्यक्ति बच्चों को कैसे शांत कर सकता है?? जीवन को सरल सहज जीने वाली मां बच्चों के हिया सागर में उठते ज्वालामुखियों को शांत कर सकती है।भौतिकता की आंधी में बही हुई नारी यह काम कदापि नहीं कर सकती।
धैर्य.....
 कैसी भी परिस्थिति हो, धैर्य ही यही वह गुण है जिसकी सहायता से उस पर काबू पाया जा सकता है। मां में धैर्य होना तो उतना ही जरूरी है जितना दिल में धड़कन और दीपक में तेल होना होता है। सदा ही जीवन में मनचाहा हो, यह कदापि संभव नहीं। समस्या जीवन में आए ही ना, यह तो हो ही नहीं सकता।ऐसे में जीवन रूपी युद्ध को धैर्य रूपी हथियार से ही जीता जा सकता है।
 फोकस होना----
 एक अच्छी मां जब स्वयं फोकस होगी तो बच्चे को भी बखूबी अपना लक्ष्य निर्धारण करने में मदद कर सकती है।
 ममता भरी---
 वात्सल्य उर्फ ममता किसी भी मां का नैसर्गिक गुण है। जीवन की इस घनी तपिश में मां का प्यार की ठंडी छांव है जो हमें सुकून और शांति देता है।मां का निस्वार्थ प्रेम शब्दातीत है।
बहादुर.....
 किसी भी विषम परिस्थिति से ना घबराने वाली माँ ही बच्चे में बहादुर बनने के बीज रोपित कर सकती है।
दूरदर्शी---
एक अच्छी मां का बहुत ही जरूरी है दूरदर्शी होना। आज का लगाया गया बीज ही भविष्य में एक दरख्त बनेगा। यह एक दूरदर्शी मां अपने बच्चे को भी बखूबी समझा सकती है।
चारित्रिक विशेषताएं---- 
शेयरिंग, केयरिंग मां से बेहतर कोई भी नहीं सिखा सकता।किसी की मदद करने की प्रवृत्ति,दया,अहिंसा, दान,इस दिशा में ज्ञान माँ ही तो देती है। धार्मिक प्रवृत्ति का विकास भी माँ ही कराती है।गर धन गया तो कुछ ना गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ तो गया, चरित्र गया तो बहुत कुछ गया।ऐसे आदर्श बच्चों को समझा कर उनकी आदतें,सोच बदल सकती है।।
                 मां के विषय में लिखने की न तो कोई शब्द सीमा है ना ही कोई भाव सीमा तय हो सकती है। करुणा की गंगोत्री से सतत बहने वाली धार है मां। कल्पना का अद्भुत सृजन है माँ। सहजता की कढ़ाई में सदैव प्रेम छौंक लगाती है मां। मधुर मिलन की मीठी सी आस है मां। मां ममता का वह अनंत अथाह सागर है जो शांत चुपचाप युगों युगों से अनुराग लहरों का सृजन करता रहता है। अपनी हिवडे में समेट लेता है, अनंत सीमा से साहिल तक प्रेम धारा,यह सर्वकालिक सार्वभौमिक सत्य है।इंद्रधनुष के सात रंग है मां। रंगोली के सुंदर रंग है मां।तरुवर की शीतल छाया है मां। हलदर का इकलौता हल है मां।बरखा की बूंदे हैं मां।सूरज की किरणें हैं मां।चांद की शीतलता है माँ।तारों की चमक है मां।मुरलीधर की मुरली है मां।आठ सिद्धि नव निधि हैं माँ।दिल की धड़कन है मां।संगीत की सरगम है माँ।आंख का नूर है मां।किताब के अल्फाज है मां।  कृष्ण की गीता,रामायण की सीता, प्रकृति की हरियाली, जीवन में सबसे निराली है मां।पंछी के पंख है मां। मंदिर का शंख है मां। गिरिजा घर की बाइबिल है मां।मस्जिद की कुरान है मां। गुरुद्वारे का ग्रंथ है मां।मंदिर का पुजारी है मां। माला का मोती है मां। दीप की ज्योति है मां। चमन का सुमन है मां।महफिल की रौनक है मां। सहजता का पर्याय है मां।जीवन में सबसे सुंदर राय है मां। मां बच्चे के अंदर अनेक चारित्रिक गुणों को रोपित करती है।मां तो शिक्षा का महासागर है।ममता का आकाश है धैर्य की धारा है वह सुरक्षा का ब्रह्मांड है। मां तो वह इंद्रधनुष है जिसमें स्नेह, सुरक्षा, अपनत्व, धैर्य, संतोष,विनम्रता और कर्मठता के सातों रंग विद्यमान होते हैं। माँ तो अनुराग के रंगों की मधुर रंगोली है। मां तो दिवाली के वे दीये हैं जिसमें आशा का प्रकाश सदा चमकता रहता है। मां तो जीवन का वह बसंत है जिसमें वात्सल्य के कुसुम सदा ही खिलते रहते हैं।मां जीवन का वह अनहद नाद है जिसे सुनने के लिए तो ब्रह्मा विष्णु और शिव भी लालायित रहते हैं। मां मानस की वे चौपाई हैं जो सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की लेखनी से लिखी जाती है। मां कर्म की वह गीता है जो फल की इच्छा किए बिना लगातार कर्मशील रहती है। मां सत्य भी है शिव भी है और सुंदर भी है। मां से सुंदर कोई रूप नहीं।मां सृजन की मूर्ति है। गुणों की खान है। सच में ही मां महान है।मां पूनम का चांद है जो हर मावस के बाद आ जाती है।माँ जीवन है।।
     "कोई ओर नहीं, कोई छोर नहीं,
     सच में माँ जैसा कोई और नहीं"।।
                     स्नेहप्रेमचन्द

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