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पाठशाला

किसी खास दिन की,
माँ की याद नही होती मोहताज़।
माँ तो यादों के कतरे कतरे में है,
बेशक अब मातृदिवस का बन
 गया हो रिवाज़।।
स्नेहप्रेमचंद

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