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पता ही नहीं चलता

उलझनों के धागे सुलझाते सुलझाते,
कुछ बेगानों को अपना बनाते बनाते,
ज़िम्मेदारियों के चूनर का घूंघट बनाते ,
ज़िन्दगी पूरी हो जाती है।

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