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किस किस बात का

चंद लफ्जों में कैसे करूं मां शुक्रिया तेरा,शब्दों भावों में नहीं वह गहराई
किस किस बात का करूं मैं शुक्रिया तेरा,मां हूं तेरी ही परछाई

जीवन देने के लिए,बेहतरीन परवरिश के लिए,कर्म से भाग्य बदलने के लिए,शिक्षा भाल पर संस्कारों का टीका लगाने के लिए,उच्चारण नहीं आचरण में हर बात लाने के लिए,विषम परिस्थितियों में भी हार न मानने के लिए,कर्म का अनहद नाद बजाने के लिए,संकल्प को सिद्धि से मिलाने के लिए,
मधुर वाणी के लिए,
ऊर्जा,उल्लास,जिजीविषा जैसे भाव पल्लवित करने के लिए,
रिश्तों को बड़े प्रेम से सहेजने के लिए,कुछ दरगुज़र कुछ दरकिनार करने के लिए,आजीवन स्नेह बरखा करने के लिए, हर क्रिया के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए,जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण के लिए,नजर नहीं नजरिया विकसित करने के लिए,अपने भीतर छिपी अगणित संभावनाओं को पहचान उन्हें निखारने के लिए,
जिंदगी भाल पर शांति तिलक लगाने के लिए, हर हालत में कभी हालातों को दोषी ना ठहराने के लिए,प्रेम भरे उपहारों के लिए, दिल से स्नेह देने के लिए,एक अच्छी मां,सहेली,मार्गदर्शक बनने के लिए,घर को जन्नत बनाने के लिए,रिश्तों की गहराई समझा ने के लिए,साफ सफाई और अच्छा भोजन बनाने की कला 
सिखाने के लिए 

मां ये फेरहिस्त तो सच में बहुत लंबी है कोई इंचीटेप नहीं बना ऐसा जो ले सकूं मैं माप इसका
और समझ सकूं इसकी गहराई

जाने के बाद भी जिक्र और जेहन में रहती है ऐसे जैसे आम पर अमराई

दिल पर दस्तक,जेहन में बसेरा, चित में पक्के निशानों से जगह बनाई

मात्र सिलाई पर फंदे ही नहीं बुनती थी मां तूं,
तूं तो नातों की भी मिठास की ऊन से कर देती थी बुनाई

चुनौतियों और संघर्षों से ना मानी हार कभी तूने,
हर आपदा को अवसर बनाने की कला में जाने कहां से प्रवीणता पाई

भूख लगी तूं बन गई तत्क्षण रोटी प्यास लगी तूं बन गई पानी,मां तूने जीने की राह सिखाई
किस किस बात का करूं मैं मां शुक्रिया तेरा,
मेरी शब्दावली को यह समझ न आई

ब्रह्म विष्णु महेश तीनों ही मां तुझ में देते हैं मुझे दिखाई
मैने भगवान को तो नहीं देखा
पर जब जब देखा मां तुझ को
यही बात समझ मां मुझे है 
आई

जिंदगी का परिचय अनुभूतियों से करवाया मां तूने,
हर संज्ञा,सर्वनाम,विशेषण से मेरी दोस्ती करवाई
जिंदगी की कच्ची स्लेट पर मा 
छवि तेरी पक्की नजर आई

ऐसी रंगरेज रही मां तूं जो रंग गई चित,चितवन,चित्र,चरित्र,चेतनअचेतन,चेष्टाएं फिर और छवि कोई नजर न आई
 तेरे इंद्रधनुष के सात रंग रहे मां स्नेह,समर्पण,सहयोग,संयम,
सहजता,साथ और जुड़ाव
हर रंग की आभा समय संग और दमक आई
जीवन की रंगोली खिली मां तुझ से ऐसी,जैसे शादी में शहनाई 

हर दुविधा को सुविधा बना देती थी मा तूं
है कौन सी भोर और सांझ ऐसी जब याद तेरी ना हो आई

चित चिंता हर लेती थी मां तूं
अभाव के प्रभाव ने तेरी जगह बताई

कितना भी खोज लो कहीं भी जा लो,नहीं मिलती मां तुझ जैसी गरमाई

शुक्रगुजार हूं मैं तेरी और अपने गुरुजनों की दिया मुझे जो अक्षर ज्ञान
यही ना होता मां मुझे तो कैसे
दे पाती अपने भावों को शब्दों से पहचान

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