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Poem on vijaydasmi# अभी थोड़ा तुम रुक जाओ# यही दशहरे का अर्थ है (( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

राम से हो तो आ जाओ मुझे जलाने
वरना जहां हो वहीं पर रुक जाओ

विकारों का अपना करो शमन तुम
सद्गुणों को भीतर ले आओ

यही अर्थ है विजयादशमी का
अपने चित को ये सत्य समझाओ

 बुराई पर अच्छाई की,अधर्म पर धर्म की होती सदा विजय है
समय रहते ही सत्य ये मान जाओ

वरना अंत होता मुझ सा है
औरों को भी समझाओ
जल जाती है लंका सोने की भी
अहसास ये खुद को करवाओ

दुनिया घूमो या ना घूमो भले ही
पर।मन के गलियारों में विचरण कर जाओ 
करो आत्म निरीक्षण,आत्म मंथन,आत्म बोध,आत्म सुधार और आत्म निखार
फिर रावण से राम तुम बन जाओ

कर लो सफर जब रावण से राम का
फिर भले ही मुझे जलाने आ जाओ

करो शमन मन के रावण का
मन में राम की लौ जलाओ
लंका से अपने चित को बंधु
अवध आ तुम बना जाओ
फिर आ जाना मुझे जलाने
अभी थोड़ा तुम रुक जाओ

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