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Thought on mother by sneh premchand

रिश्तों की उड़दन की माँ करती रहती है  तुरपाई।
कर्म की स्याही से  मेहनत की बही माँ ने अपने सतत श्रम से बनाई।।
पर इसे कहें विडम्बना या दुर्भागय, बच्चों को यह पढ़नी नही आयी।।

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