Skip to main content

Poem on mothers love by sneh premchand दे साथ लेखनी

दे साथ लेखनी,कुछ लिखेंगे ऐसा
जो करेगा जननी को श्रद्धांजलि का काम।

एक बिना ही जग लगता है सूना
माँ है ईश्वर का ही दूसरा नाम।।

वो कितनी अच्छी थी,
वो कितनी प्यारी थी,

वो हंसती थी
वो हंसाती थी
कभी शिकन  अपने चेहरे पर
भूल से भी न लाती थी।

बहुत परेशान होती थी जब
तब बस माँ चुप हो जाती थी।

न गिला,न शिकवा,न शिकायत कोई
ऐसी माँ को शत शत हो परनाम।

दे साथ लेखनी,कुछ लिखेंगे ऐसा
करेगा जो जननी को श्रद्धांजलि का काम।

भोर देखी ,न दिन देखा
न रात देखी,न देखी शाम।

घड़ी की सुइयों जैसी
चलती रही सतत वो

फिर एक दिन
ज़िन्दगी को लग गया विराम।

वो आज भी हर अहसास में जिंदा है
बाद महसूस करने की नज़र चाहिए।

है जीवन माँ का एक प्रेरणा
बस प्रेरित हिने की फितरत चाहिए।।

रोम रोम माँ ऋणि है तेरा
ज़र्रा ज़र्रा करता है तुझे सलाम।।

Comments

Popular posts from this blog

वही मित्र है((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

कह सकें हम जिनसे बातें दिल की, वही मित्र है। जो हमारे गुण और अवगुण दोनों से ही परिचित होते हैं, वही मित्र हैं। जहां औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं होती,वहां मित्र हैं।। जाति, धर्म, रंगभेद, प्रांत, शहर,देश,आयु,हर सरहद से जो पार खड़े हैं वही मित्र हैं।। *कुछ कर दरगुजर कुछ कर दरकिनार* यही होता है सच्ची मित्रता का आधार।। मान है मित्रता,और है मनुहार। स्नेह है मित्रता,और है सच्चा दुलार। नाता नहीं बेशक ये खून का, पर है मित्रता अपनेपन का सार।। छोटी छोटी बातों का मित्र कभी बुरा नहीं मानते। क्योंकि कैसा है मित्र उनका, ये बखूबी हैं जानते।। मित्रता जरूरी नहीं एक जैसे व्यक्तित्व के लोगों में ही हो, कान्हा और सुदामा की मित्रता इसका सटीक उदाहरण है। राम और सुग्रीव की मित्रता भी विचारणीय है।। हर भाव जिससे हम साझा कर सकें और मन यह ना सोचें कि यह बताने से मित्र क्या सोचेगा?? वही मित्र है।। बाज़ औकात, मित्र हमारे भविष्य के बारे में भी हम से बेहतर जान लेते हैं। सबसे पहली मित्र,सबसे प्यारी मित्र मां होती है,किसी भी सच्चे और गहरे नाते की पहली शर्त मित्र होना है।। मित्र मजाक ज़रूर करते हैं,परंतु कटाक...

बुआ भतीजी

महिला(( नारी शक्ति पर बेहतरीन कविता स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

मजबूत हौंसला,बुलंद इरादे, आज की महिला की यही पहचान दिल पर दस्तक,दिमाग में बसेरा चित में इसके पक्के निशान महिला ही तो देती है जन्म सृष्टि को सच में ईश्वर का धरा पर है वरदान अपनी जान पर खेल हमें जगत में लाने वाली के लिए बहुत छोटा है शब्द महान जीवन की डगर आसान नहीं किसी भी महिला की, संकल्प से सिद्धि तक के सफर में कितने ही आते हैं व्यवधान पर वो रुकती नहीं है,चलती रहती है बेशक जानती नहीं परिणाम  अपने ही पर्याय को उतार   धरा पर बेफिक्र सा हो गया भगवान खास नहीं अति खास मूढ में रहा होगा  विधाता,  जब नारी का किया होगा निर्माण आज कोई भी क्षेत्र नहीं अछूता नारी शक्ति से, हर क्षेत्र में नारी ने बना ली है पहचान दिल दिमाग में सामंजस्य बिठाना आता है नारी को, सदा ऋणी रहेगा नारी का ये जहान