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दरकिनार thought by snehpremchand

एक नहीं,दो नहीं,
एक बार में ही बता दे कोई,
आखिर कितनी बार???
हर मर्तबा दरक जाता है
 वजूद का कोई न कोई हिस्सा,
करूं भी तो करूं कितनी बार दरकिनार।।
अपने ही जब देते हैं जख्म,
न मिले कहीं मरहम,
नासूर बन जख्म जेहन में
 हो जाता है शुमार।
दरगुजर भी किया और 
कितनी ही बार किया दरकिनार।।
पर हर बार चोटिल हुई भावनाएं,
टूटे हर बार मन के तार।।
      Snehpremchand

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