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चित्रकूट में ऐसा भरत मिलाप हुआ(( स्तुति स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*सजल सजल से नयन हुए, बिन बोले ही वार्तालाप हुआ हृदय हृदय का मिलन हुआ कम कुछ तो विरह का ताप हुआ* छलक छलक से गए थे आंसू भरत को भारी पश्चाताप हुआ,  ग्लानि ग्रस्त सा चित था उसका अपराध बोध का आभास हुआ, *अधीर भरत को धीर धराया  रघुराई से प्यारे भाई ने, भारत भी रोए लगकर सीने से राम के,बांवरा सा बना दिया था जुदाई ने*  *क्षमा करो मेरे प्यारे भाई! माता कैकेई के कारण यह विनाश हुआ  कुमति ने कैसे हरी मति माता की, भाई मुझे अत्यधिक कष्ट संताप हुआ*  देख व्यथित भारत को इतना प्रेम से बोले रघुराई  जो गलती तुमने की ही नहीं, उसकी किस बात की क्षमा मांगते हो भाई?? *अति प्रिय हो भरत मुझे तुम मेरे चित में हर पल का है वास तुम्हारा क्षमा करो मां कैकेई को, यही पुत्रधर्म है भाई हमारा* बहुत मनाया भरत,माताओं और प्रजा ने राम को अयोध्या वापस लौटने के लिए, पर बड़ी विनम्रता से राम ने यह प्रस्ताव ठुकराया *प्राण जाएं पर वचन न जाएं* ऐसा बार बार दोहराया नहीं माने जब राम तो भरत ने राम की मांगी खड़ाऊँ,और उन्हें अपने शीर्ष पर बिठाया *बड़े प्रेम से कहा भरत ने,14 बरस से अधिक आपने गर एक...