*सजल सजल से नयन हुए,
बिन बोले ही वार्तालाप हुआ
हृदय हृदय का मिलन हुआ
कम कुछ तो विरह का ताप हुआ*
छलक छलक से गए थे आंसू
भरत को भारी पश्चाताप हुआ,
ग्लानि ग्रस्त सा चित था उसका अपराध बोध का आभास हुआ,
*अधीर भरत को धीर धराया
रघुराई से प्यारे भाई ने,
भारत भी रोए लगकर सीने से राम के,बांवरा सा बना दिया था जुदाई ने*
*क्षमा करो मेरे प्यारे भाई! माता कैकेई के कारण यह विनाश हुआ
कुमति ने कैसे हरी मति माता की, भाई मुझे अत्यधिक कष्ट संताप हुआ*
देख व्यथित भारत को इतना प्रेम से बोले रघुराई
जो गलती तुमने की ही नहीं, उसकी किस बात की क्षमा मांगते हो भाई??
*अति प्रिय हो भरत मुझे तुम
मेरे चित में हर पल का है वास तुम्हारा
क्षमा करो मां कैकेई को,
यही पुत्रधर्म है भाई हमारा*
बहुत मनाया भरत,माताओं और प्रजा ने राम को अयोध्या वापस लौटने के लिए,
पर बड़ी विनम्रता से राम ने यह प्रस्ताव ठुकराया
*प्राण जाएं पर वचन न जाएं* ऐसा बार बार दोहराया
नहीं माने जब राम तो भरत ने राम की मांगी खड़ाऊँ,और उन्हें अपने शीर्ष पर बिठाया
*बड़े प्रेम से कहा भरत ने,14 बरस से अधिक आपने गर एक क्षण भी अधिक लगाया
मुझे ना ज़िंदा देखोगे फिर,
ऐसा अपना फैंसला सुनाया*
*राम ने हामी भरी इस बात की
और ह्रदय से भरत को लगाया
सबने देखा चित्रकूट में ऐसे भरत मिलाप को,
देख जिसे मन भर आया
भाई भाई में ऐसा प्रेम हो तो
धरा पर ही जीवन स्वर्ग हो आया*
*जब भी जाना यह *भरत मिलाप* प्रसंग
लंका सा मन पल भर में अयोध्या हो आया*
*त्याग,समर्पण,स्नेह,सम्मान,मर्यादाकरुणा की गाथा है *राघव गाथा*
जहां भाई ने भाई को प्रेम सिखाया*
*संपत्ति नहीं बांटी आपस में,
सुख दुख बांटे,जिसे पढ़ तन पुलकित और मन आह्लादित हो आया*
*इस से प्यारी कथा कोई और कहाँ होगी जहां त्याग करने में सब प्रथम आना चाहते हैं,एक दूजे के लिए दिल में आदर भाव रखते हैं,सच में कोई भी नहीं*
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