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जब पुतला रावण का बोल उठा((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा राघव गाथा अंश))

**जब पुतला रावण का बोल उठा**

दशहरे के रोज़ लोगों का जब आया हुजूम तो पुतला रावण का अचानक ही बोल उठा,जो बोला तनिक करना मंथन उसका, सच में सत्य का सिंहासन डोल उठा,मुझे तो मारा था श्री राम ने,क्या रामचरित्र का एक भी गुण तुम्हें अपने भीतर नजर आता है?मर्यादा प्रतिबद्धता,सत्य, वचन पालन,शील, विनम्रता,विवेक ज्ञान,त्याग,सहजता इन सब से क्या कोई तुम्हारा नाता है? मेरा पुतला जलाना है तो पहले चित में एक राम गुण तो ले आओ,उससे पहले होगा बेहतर मेरे पास ना तुम आओ,बरसों से जला रहे हो मुझको,जरा अपने चित को भी समझाओ,क्या विजय पा ली है विकारों पर तुमने तो लपटों के हवाले मुझे कर जाओ,मुझे तो मेरे अहंकार ने मेरे अंत तक पहुंचाया,बहुत समझाया मंदोदरी ने मुझे,पर मुझे समझ में नहीं आया,जली मेरी सोने की लंका मेरे अपनों को भी मैं बचा पाया,भाई गए,पुत्र गए,गई जाने कितनी ही सेना,मेरे अहंकार ने मुझे सबसे जुदा करवाया,रामशरण आ जाता मैं तो अंत ना यह होता पाया,पर स्त्री हरण का जघन्य पाप किया है मैने,क्यों सही समय पर चित को मैने नहीं समझाया,आज भी यही बुराई फैली हुई है हर दिशा में,तुम में से जाने कितनों ने इसे होगा अपनाया,जब तक नहीं बदलोगे दृष्टि,सृष्टि कैसे जन्नत सी बन पाएगी,नजर नहीं नजरिया बदलेगा जब तुम्हारा,सबकी बहन बेटियां अपनी ही बहन बेटियां नजर आएगी, सही मायनों में होगी वही दिवाली,कब बात समझ में आएगी?जब पुतला रावण का यह बोल उठा हुए सोचने को सब मजबूर,यही अर्थ है विजयदशमी का,चित,चेतन,अचेतन,चरित्र,चेष्टाओं से बुराई करें हम दूर,मर्यादा में रह कर करें मर्यादित व्यवहार,होता है जो सच्चा नूर स्नेह प्रेमचंद ((राघव गाथा))

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