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बसे हो जैसे चित में हनुमन के,मेरे भी राम बस जाओ((स्तुति स्नेह प्रेमचंद द्वारा राघव गाथा अंश))

*बसे हो जैसे चित में हनुमन के,
मेरे भी राम बस जाओ*
*नहीं चित,है मेरा निर्मल
इसे निर्मल सा कर जाओ*

*बसे हो जैसे चित में शबरी के,
मेरे भी राम बस जाओ*
नहीं श्रद्धा है शबरी सी,
मुझे श्रद्धा ये दे जाओ
जो साचे प्रेम से शबरी,
वे झूठे बेर खिलाती है
उन्हें खाते हो तुम दिल से,
कि कोयल कूक जाती है
ना भूले कोई शबरी को,
ये पूरे जग को समझाओ
बसे हो जैसे चित में शबरी के,
मेरे भी राम बस जाओ

बसे हो जैसे चित में लक्ष्मण के,
मेरे भी राम बस जाओ
नहीं मैं भाई लक्ष्मण सा,
मुझे वैसा बना जाओ
कि भाई शक्ति भाई की,
ये पूरे जग को समझाओ

बसे हो जैसे चित में*केवट*के,
मेरे भी राम बस जाओ
नहीं मैं शुद्ध केवट सा,
मुझे भव पार करवाओ

बसे हो जैसे चित में*विभीषण* के,
मेरे भी राम बस जाओ
नहीं निष्ठा है उस जैसी,
मेरे चित में जगा जाओ
सहारे शरणागत के हो....२
सहारा मुझे भी दे जाओ

बसे हो जैसे चित में*दशरथ* के
मेरे भी राम बस जाओ
नहीं बेटा मैं तुझ सा.....२
कोई गुण अपना दे जाओ
पिता की मान कर आज्ञा,
कि वन की ओर जाते हो
नहीं कोई लोभ है चित में,
जगत को ये बताते हो

बसे हो जैसे चित में*सीता*के,
मेरे भी राम बस जाओ
नहीं मैं सीता सी उजली,
मुझे उजला बना जाओ

बसे हो जैसे चित में*कौशल्या*के 
मेरे भी राम बस जाओ
नहीं मैं वैसी माता हूं,
वह ममता मुझ को दे जाओ

बसे हो जैसे चित में*अहिल्या*के
मेरे भी राम बस जाओ
किया उद्धार था उनका,
जगत का भी तो कर जाओ

बसे हो जैसे चित में*विश्वामित्र* के,
मेरे भी दिल में बस जाओ
स्नेह संग करते हो सम्मान गुरु का,
मति मेरी भी फिरवाओ

बसे हो जैसे चित में*प्रजा* के
मेरे भी राम बस जाओ
मेरा मन लंका सा है जो,
अवध सा उसको कर जाओ
अभी नहीं ज्ञान है मुझ को,
अंधेरे दूर कर जाओ
मेरे मन पर जमी है धूलि,
उसे तुम साफ कर जाओ
सफल हो ये जन्म मेरा,
कर्म ऐसा तो करवाओ
मैं झांकू अपने ही भीतर,
कि ऐसी दृष्टि दे जाओ
अभी मैं अधम पापी हूं,
कि रूह उजली सी कर जाओ
*करुणा* चित में जागे रे 
करुणा सिंधु कुछ कर जाओ
*महाभारत*सा है जो मन
उसे *रामायण* सा कर जाओ
शमन कर दो विकारों का,
गुणों का तोहफा दे जाओ



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