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हे राघव फिर से आ जाओ( स्तुति स्नेह प्रेमचंद द्वारा राघव गाथा अंश))

*हे राघव!फिर से आ जाओ
आहत है इंसान*
*खौफजदा हैं बालक तेरे,
कर कृपा तू करुणा निधान*

फिर जागा है रावण काम क्रोध का,
जीना हुआ है सबका हराम
कर दो मर्दन,जग करे क्रंदन,
हुआ जैसे युद्ध भीतर कोई घमासान
पीड़ा हर ले,निर्भय कर दे
कर दे ना तू जग कल्याण

खौफजदा है बालक तेरा, 
सुन ले ना अब तो भगवान
 श्रद्धा नहीं अब चित में शबरी सी,
खोज लो चाहे जहान
भगति में होती है सच्ची शक्ति,
जाने ना इंसा नादान
निर्मल चित नहीं कर पाता है,
मलिनता का धरता है वह ध्यान

भगति नहीं अब बजरंगी सी चित में जन के,भगति भाव बनाता हमें धनवान
आए थे सीने में नजर तुम बजरंगी के,
बड़े बड़े काज किए भक्तों के बजरंगी ने,ले कर राम तेरा ही नाम

त्याग नहीं कोई करे केवट सा,
चाहे मुक्ति का फिर क्यों दान?? 
*चित निर्मल तो कण कण तीर्थ
चित निर्मल तो कण कण धाम*
छोटी सी बात,पर है गहरी सी,
जान ले ना इंसा नादान

आए शरण ना कोई विभीषण सा
फिर हो कैसे  उसका कल्याण??
बने ना मित्र कोई विभीषण सा जग में,
मित्रता का हो कैसे ज्ञान???

नारी अस्मिता के हो संरक्षक,
है बड़ा आपसे,आपका नाम
फिर से आ जाओ ना राघव
कर दो ना अब जग कल्याण

आए फिर से राम राज्य पहले सा,
जन्नत सी बन जाए यह धरा महान
कोई भेद ना हो,कोई भाव ना हो,
*राम राज्य* का सब समझें विज्ञान

हर बाला हो निर्भय और सुरक्षित जहां में,अनुकरणीय आपके कदमों के निशान

त्याग,समर्पण,शौर्य,संयम,सदाचार
ये गुण ही रहे आपके व्यक्तित्व का आधार
फिर से इन गुणों की घुट्टी जन जन को राम पिला जाओ

फिर जन्मे ना धरा पर कोई अहंकारी कामी रावण,
स्वर्ग सा धरा को बना जाओ
कैसे स्नेह सूत्र से बंधे रहते हैं पावन नाते,
सौहार्द का रामसेतु बनाना हमें सिखाओ
फिर से आ जाओ ना राघव
भ्रमित सा है इंसान
राह दिखाओ,सत्यदीप जलाओ
मन की दिवाली का करो आह्वान
रघुपति राघव राजा राम



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