*हो उदित भोर फिर आशा की
मिटे नैराश्य का अंधकार*
*राम नाम अति मीठा है
करके देखो इसे दिल से प्यार*
*अंतर्मन के गलियारों में,
जब भी विचरण करने जाओगे
राम नाम के हीरे मोती
वहां से निकाल कर लाओगे*
*धर्म,सत्य होते हैं विजयी सदा
उच्चारण नहीं आचरण में इसे अपनाओगे*
*सही मायने में अर्थ दिवाली का
तभी समझ तुम पाओगे*
मन में दीप प्रज्वलित होंगे आशा के
संकल्प मिलेगा सिद्धि से हर बार
*हो उदित भोर फिर आशा की,
मिटे नैराश्य का अंधकार*
*सिया लखन संग राम की मूरत
चित में अपने धरनी होगी
हो मन में गर कोई विकार तो,
चितभूमि निर्मल करनी होगी*
*हुआ बहुत अब करो चित निर्मल
सही मायने में होगी जय जयकार*
*हो उदित भोर फिर आशा की
मिटे नैराश्य का अंधकार*
*काम क्रोध मद लोभ मोह
सच में लाते हैं अंधकार*
*भाई भाई के लिए जहां छोड़ देता है राजपाठ,
वहां सच्ची रामायण के होते दीदार*
*भाई जहां भाई को सुई की नोक समान नहीं देता भूमि,
महाभारत होने को सदा रहेगी तैयार*
*अंतर रामायण और महाभारत में आए समझ अब,
विवेक सत्कर्मों का करेगा वहां श्रृंगार*
*राम को देखो,राम को जानो,राम को समझो कैसे परिस्थिति पर मनःस्थिति रही सदा उनकी भारी,
संघर्षों से पग पग पर होता रहा साक्षात्कार*
*चुनौती को अवसर बना दिया राम ने,संघर्षों से ना मानी हार*
*जो मूल्य रोपित थे बाल चित में उनके,आगे भी होता रहा अभिवर्धन उनमें हर बार*
*हो उदित भोर अब आशा की,
मिटे नैराश्य का अंधकार*
मां! पिता जी ने मुझे जंगल का राज दिया है ऐसे कथन से मां को बताई सच्चाई,
कितने प्रबल और सुंदर राम के रहे संस्कार
*गुरु हो गर विश्वामित्र तो
शिष्य राम बन जाता है*
*तराश तराश बना देता है गुरु हीरा
ऐसा गुरु शिष्य का नाता है*
सदा निभाया नाता गुरु से,
शिक्षा भाल पर सोहे संस्कार
हो उदित भोर अब आशा की,
मिटे नैराश्य का अंधकार
*राम कर्ता भी हैं,कारण भी हैं,
भगति भी हैं शक्ति भी हैं
मर्यादा भी हैं वायदा भी हैं
संकल्प भी राम सिद्धि भी राम
त्याग भी राम,प्रतिबद्धता भी राम
छाया भी राम और घाम भी राम
सहजता भी राम सरलता भी राम
तेज भी राम विनम्रता भी राम
सहयोग भी राम कर्मयोग भी राम
अभिव्यक्ति भी राम अनुभूति भी राम
एक राम पर अनेक भावों का सुंदर संसार
हर रूप सिखाता है उनका,
सतकर्म हमारे सच्चे अलंकार
हो उदित भोर अब आशा की,
मिटे नैराश्य का अंधकार
*बड़ा कमज़ोर है आदमी
विकारों के चक्रव्यूह में फंस
सद्गुणों के नहीं करता दीदार*
*चयन गलत हो जाता है
जब अच्छे नहीं होते सलाहकार*
*मंथरा ने ही बरगलाया केकई को,
जीत कर भी केकई गई थी हार*
*अब ना हो कोई मंथरा ना हो कोई रावण जग में,राम राज्य आ जाए फिर से,मानवता सत्कर्मों का करे श्रृंगार*
*हो उदित भोर फिर आशा की
मिटे नैराश्य का अंधकार*
भाइयों में प्रेम हो अवध कुमारों सा,
त्याग समर्पण को हों जो तैयार
दाम्पत्य प्रेम सीखो रामायण से,
जहां गुणों का हुआ सदा 16 श्रृंगार
मात तात और गुरुजनों को देना स्नेह
सम्मान हर बार
मित्रता निभाना राम सुग्रीव सी,
जहां जाति धर्म ना हो आधार
भगति करना शबरी बजरंगी सी,
सफलता करेगी वरण तुम्हारा हर बार
कामी अहंकारी ना बनना कभी रावण
सा,शक्तिशाली होते हुए भी मिलेगी हार
*सब सीखोगे रामायण से तो
मिट जाएगा नैराश्य का तमस और निश्चित ही आशा की भोर का होगा प्रादुर्भव,करो ऐतबार*
स्नेह प्रेमचंद
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