जब मां के बच्चे होते हैं तो
मन से कितने बेपरवाह से होते हैं
कोई चित चिंता नहीं होती है
और नींद मज़े की सोते हैं
याद आता है
अहोई अष्टमी का व्रत जब मां
कितनी लगन से
हमारे लिए रखा करती थी
ताई जी के यहां जा सुनती कहानी
और जल का लौटा भरती थी
अपनी दुआओं में मां सातों का भला चित में धारण करती थी
जैसे हमारे सुखद भविष्य के लिए
कोई संकल्प सा चित में भरती थी
मां की परवाह बता देती थी मां स्नेह कितना हम से करती थी
किसी और नाते में ना कशिश है वह ना भाव है वह,
मां तो ममता का सागर
अपने चित में भरती थी
मां का कोई मुकाबला नहीं,
मां धरा पर रह कर नभ को छुआ करती थी
मुझे तो मेरी मां राम सी नजर आई सदा,जो नित नित संघर्षों से अकेले ही जूझा करती थी
चुनौती को अवसर बनाना आता था मेरी मां को,
अभाव के किसी भी प्रभाव को कभी न चित में धरती थी
हर परिस्थिति पर मनःस्थिति को कर हावी,
पूरी प्रतिबद्धता से लक्ष्य की ओर पल पल बढ़ती थी
*राम सा* सिद्ध कर दिया मां ने,
*साधन और संसाधनों* से
महत्वपूर्ण *सच्ची साधना* है
मां कभी उदासी
चित में नहीं भरती थी
*राम ही राम पुकारेंगे
कभी ना बाजी हारेंगे*
मां उच्चारण में नहीं
आचरण में सब यह करती थी
तारों की शीतल छाया तले
मां बड़े प्रेम से चूरमा बनाती थी
हम सातों उठ जाते थे
मां हम पर वारी जाती थी
मैं मां जैसी मां हूं या नहीं
इसका मुझ को बोध नहीं
माँ पर लेखनी चलाने से
बेहतर सच में कोई शोध नहीं
मां की *स्मृतियां* बनी हैं सहारा
थके पथिक को पंथा सी
जल और जीवन दोनों में रही मां
सच में जैसे *हंसा*सी
कर्म बोझ नहीं आनन्द था मां के लिए,परमानंद की अनुभूति कर्मठ रहते हुए मां मेरी करती थी
जब भी आते हैं ये दिन दिवाली के
याद आता है मां का जीवन के प्रति अगाध सा प्यार
कितनी तन्मयता से मनाती थी मां *करवा कमोई*
मां ने ही जीवन में ऊर्जा उल्लास का किया संचार
आज *अहोई अष्टमी* पर *मां अहोई* और *मां सावित्री* को शत शत नमन
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